Monday, February 05, 2018

15 साल पुराना लेख : प्रेम पर पहरा


यूथ प्लस, दैनिक भास्कर, मंगलवार, 15 अप्रैल 2003
प्रेम पर पहरा क्यों ?


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प्रेम मानव को प्रकृति का सबसे खूबसूरत उपहार है। हर क्रांतिकारी का मूल स्वप्न प्रेम होता है। लगातार प्रेमविहीन हो रहे समाज में प्रेम की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए हम सबको सोचना है।
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क्या किशोर-किशोरियों का सार्वजनिक जगहों पर एक साथ घूमना और परस्पर प्रेम प्रदर्शन करना ठीक है? पंचकूला पुलिस द्वारा बुजुर्गों की शिकायत पर युवाओं को पकड़ने और उनके माता-पिता को बुलाने की घटना से यह बात चर्चा का विषय बनी है। अधिकतर लोग इसे नैतिकता का सवाल मानते हैं, जबकि युवा इसे अक्सर तिल का ताड़ बनाने की मूर्खता मानते हैं।
आज इलैक्ट्रानिक मीडिया पर जैसे दृश्य हम देखते हैं, उसके बाद युवाओं के प्रेम पर सवाल उठाना वाजिब नहीं लगता। अपने घर में बैठकर टीवी पर हर पांच मिनट में चुम्बनों से भरा जांघिया पहना मर्द, कनिष्ठिका उठाए आई वाना डू, कुछ भी हो सकता है के सरकते वस्त्र आदि-आदि देखने में हमें कोई आपत्ति नहीं। यौवन का प्रेम जो कुदरती है,- अरे बाप रे, कुछ हो गया तो? छिः छिः, जहां ये युवा बैठते हैं, हम वहां से गुजर भी नहीं सकते।
जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नंगेज की भरमार है और घटिया, बीमार नंगेज दिखाकर हमारी चाहतों का शोषण करने के लिए अंतड़ियों तक पहुंचती पूंजीवादी व्यवस्था की बौछार हो रही है, तब कोई सरकार, कोई पुलिस परेशान नहीं। यह तो पूंजी निवेश है, साबुन के साथ-साथ दिमाग में कुछ बीमारी भी घुसे तो क्या हुआ। किसी मित्र के साथ खाना मत खाइए, डांस मत कीजिए, बस मौके की ताक में रहिए कि कोई न देखे तो तुरंत अपना लिजलिजा हाथ उसके अंगों पर मारिए। औरत इंसान नहीं महज उपयोग की वस्तु है। यह मानसिकता है।
प्रेम पर रोक लगाकर कुंठित मन पर इलेक्ट्रॉनिक चमक-दमक के साथ औरतों के वस्तुकरण का हमला जारी है। चूंकि प्रेम स्वीकार्य ही नहीं, तो प्रेम के बारे में बात क्या करें? इसलिए जिम्मेदारी से प्रेम निभाने की बातचीत भी नहीं हो सकती। समुचित यौन शिक्षा, गैर जिम्मेदार यौन संबंध के खतरे, एड्स जैसी बीमारियां - कोई बातचीत खुले आम नहीं होगी। छिप-छिप कर बातचीत करें, सही-गलत बातें जानें - हो सकता है संस्कृति के ठेकेदारों को यह ठीक लगता हो, पर सच्चाई यह है कि इससे देश और समाज अंधेरे में डूबता ही जाएगा।
पुरुष-प्रधान समाज में औरतों और बच्चों को सदियों से यौन-शोषण का शिकार बनाया गया है। सुविधा-संपन्न और ताकतवर लोगों ने विपन्न औरतों को, जैसे जमींदारों ने खेत मजूरों को शारीरिक रूप से सताया है। चाहत के पूंजीवादी शोषण का इलेक्ट्रॉनिक स्वरुप उसी कड़ी में औरतों और बच्चों पर जुल्म को बढ़ाता है। प्रेम महज दो लोगों का परस्पर बंधन नहीं, कुंठाग्रस्त और बीमार समाज के खिलाफ विद्रोह भी है। इसीलिए प्रेम-प्रसंग को जीवन में होते देखना समाज के प्रतिष्ठित वर्गों को खतरनाक लगता है। प्रेम की पुनर्प्रतिष्ठा हर विद्रोही का नारा होना चाहिए। इसीलिए कवि जो स्वभाव से ही विद्रोही होते हैं, हमेशा प्रेम-राग में डूबे होते हैं।
हमारे समाज में प्रेम हमेशा ही विवादास्पद रहा है। प्रेमियों की तड़प को अपनी तड़प मान लेना फिल्मों, नाटकों को देखते हुए या कहानी-उपन्यास पढ़ते हुए तो ठीक है, पर अपनी ज़िंदगी में खुद को छोड़कर बाकी सबके प्रेम में खोट ढूंढना हमारी सांस्कृतिक पहचान है। इसलिए अक्सर समझदार लोग भी इस विषय पर बोलते हुए संस्कृति का हवाला देते हैं और ‘ऐसा होगा तो गली-गली में लोग लेटे हुए मिलेंगे,’ जैसी घटिया बातें करते हुए बहस करते हैं। इनमें से कुछेक ने ही फिल्मी ही सही, राधा-कृष्ण की रास-लीलाओं के बारे में देखा-सुना होता है। शंकराचार्य की सौंदर्यलहरी में शिव पार्वती के सौंदर्य की स्तुति तक तो इनकी पहुंच हो नहीं सकती। हीर-रांझा, शीरीं-फरहाद जैसी लोककथाएं इनकी स्मृति से विलुप्त हो चुकी हैं। प्रेम जैसे ही प्रकृति के अन्य सुंदर अवदानों को नष्ट करने में भी लोग तत्पर रहते हैं। मसलन सुबह के नैसर्गिक सौंदर्य को मंदिर-गुरुद्वारों से यांत्रिक शोर से नष्ट करने में ये संस्कृति और परंपरा की महानता देखते हैं। प्रेम में खोट ढूंढने वाले ये महानुभाव खुद ही इतने बीमार हैं कि इनको धर्म के नाम पर सैकड़ों का खून बहाने में बड़ा आनंद आता है। कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ने का सपना देखती रहे, हम तो मंदिर-मस्जिद के लिए लड़ेंगे।
देशभर में ध्वनि-प्रदूषण के खिलाफ कानून बने हैं। सभी डॉक्टर, सभी वैज्ञानिक आपसे कहेंगे कि ध्वनि-प्रदूषण से अनगिनत बीमारियां होती हैं। कोशिश कीजिये कि पुलिस को सुबह मंदिर-गुरुद्वारों-मस्जिदों से होते ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए कहें। पर पुलिस भला इसे क्यों रोके? लेकिन दो युवा परस्पर स्नेह प्रकट करने पार्क में गए हैं, तो तुरंत पुलिस को यकीन हो जाता है कि यह समाज, देश, संस्कृति व नैतिकता के खिलाफ बहुत बड़ा षड़यंत्र है। युवाओं में अधिकतर, सरकार चुनने वाले अठारह से अधिक उम्र के नागरिक हैं, जिनके संवैधानिक अधिकारों का खुलेआम हनन करने में पुलिस को कोई शर्म नहीं। पूरे प्रदेश में नशीले पदार्थों की ट्रैफिकिंग, धनवानों और राजनैतिक शक्ति संपन्न लोगों के लिए गैर-कानूनी यौन-कर्मियों की ट्रैफिकिंग -- सब लोग जानते हैं ये समस्याएं कितनी गंभीर हैं, पर पुलिस की आंखों के सामने सिर्फ ये युवा हैं, जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र न होने के कारण अभी कमजोर हैं। इसलिए उन्हीं को पकड़कर मां-बाप से वाहवाही क्यों न लूटी जाए।
मां-बाप क्यों चाहते हैं कि उनके बच्चे डेटिंग न करें? इसलिए कि उनमें डर है। जाति-प्रथा की कुरीतियों से ग्रस्त इस समाज में प्रेम विद्रोह का बिगुल बजाता है। इसके अलावा जो बच्चा अपने आप स्नेह संबंध का निर्णय ले सकता है, उस पर नियंत्रण कैसे रखा जाए? खास तौर पर बेटियों के माता-पिता तो इसी चिंता से परेशान रहते हैं कि कुछ हो गया तो शादी कैसे करवाएंगे?
तो आखिर इसका समाधान क्या है? जो प्राकृतिक है - उसे रोका नहीं जा सकता। सही यह है कि माता-पिता और संतान के बीच स्वाभाविक संबंध हों। अपनी चाहतों के बारे में युवाओं को माता-पिता के साथ निडर होकर बातचीत करने की छूट होनी चाहिए। ऐसा होता नहीं है क्योंकि बुजुर्गियत अक्सर ‘हम बेहतर जानते हैं’ का बोझ लिए आती है। पीढ़ियों में ज्ञान के साथ-साथ अहसासों-जज्बातों का जैसा फर्क आज है, ऐसा पहले कभी न था। वैसे भी किशोर वय को पहुंच चुकी संतान को बच्चे जैसा नहीं, मित्र जैसा मानना चाहिए। मां-बाप को अपना अनुभव बांटना चाहिए, न कि उम्र और शक्ति का डंडा बरतना चाहिए।
अगर प्रेम के यौन संबंध में परिणत होने की संभावना है, तो संस्कृति पर खोखला भाषण इसे रोक नहीं सकता। हमें युवाओं को यौन-संबंध की जिम्मेदारियों के बारे में सचेत करना चाहिए। साथ ही उनमें खुली बातचीत का हौसला बढ़ाना चाहिए, ताकि अगर वे किसी समस्या में हों, तो तुरंत उसका उपचार कर सकें। कम उम्र में गर्भ से बचने के लिए यौन-संबंध से परहेज के लिए भी उन्हें समझाया जा सकता है। युवाओं में आवेग और आवेश को बांधने की क्षमता भी होती है, बशर्तें उन्हें यह विश्वास हो कि यह आवश्यक है।
युवाओं को भी अपने माता-पिता की सीमाओं और चिंताओं को समझना चाहिए। मां-बाप ने वर्षों तकलीफें झेलकर संतान को बड़ा किया है। उसके सुरक्षित भविष्य के लिए उनके सही-गलत विचार हैं। रात-रात नींद खोकर उन्होंने बच्चों के बारे में सोचा है। इसलिए उन्हें लगता है कि बच्चे पर, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण का हक उन्हें है। जब बच्चा युवावस्था में आता है, उसे संजीदा तरीके से मां-बाप को समझाना है कि वह बड़ा हो गया है। अपने मां-बाप के साथ मन खोलकर उसे बातें करनी चाहिए। उन मां-बाप से क्या शर्म, जिन्होंने वर्षों बच्चे को गोद में पाला है। मां-बाप सख्ती अपनाते हैं तो धैर्य के साथ उसका विरोध करना है। साथ ही युवाओं को समाज की बदलती मान्यताओं को परखना है। हर बदलती मान्यता ठीक हो, जरुरी नहीं। युवाओं में से असामाजिक तत्वों को पहचान कर उन्हें पुलिस या उचित अधिकारियों को सौंपना भी उनकी अपनी जिम्मेदारी होनी चाहिए। गैर-जिम्मेदाराना हरकतों से न केवल उन पर प्रतिबंध बढ़ेंगे, उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ेगा।

Monday, January 29, 2018

लोग बर्फ बन गए हैं

'कादंबिनी' के ताज़ा अंक में प्रकाशित कविताएँ - 
इनको मैंने हैदराबाद लिट फेस्ट में भी पढ़ा था। A quick translation follows after the Hindi original.


सपनों में बर्फ होती धरती

1
चारों ओर
लोग ठोस बर्फ बन गए हैं
सूरज उन पर बरसते थक गया है
और वे पिघलते नहीं हैं
सूरज पास आकर उनसे टकराता है
और मैं सोचता हूँ कि पिघल ही जाएँगे
कि रोशनी उनके आरपार होगी
तो वे यह सोच कर रोएँगे
कि वे जिस जंग में शामिल हैं
उसकी आग से धरती की सतह पर छायादार खयाल जल गए हैं
सूरज थक गया है
कि वह छाया ओढ़ कर कहीं सो नहीं पाता
सूरज ने कई जंगें देखी हैं
उसे पता है
कि हर जंग से पहले और कई जंगें होती हैं
कि कहाँ शुरु कहाँ खत्म
इस हिसाब में दुनिया भर में माँएँ रोती हैं
चाहता हूँ कि लोग माँ के आँसू देखें

लोगों की नज़र बर्फ बन गई है।

2

मेरे पास से बर्फ बन चुका एक आदमी गुजर गया
मुझे लगा कि वह पिघले तो मुझे ठंडा पानी पाने को मिलेगा
उसके पास बैठूँ तो मुझपर छाया उतर आएगी
मैं सोच रहा था कि वह बैठने देगा या नहीं देगा
कि उसने एक साथ अल्लाह ओ अकबर और जै श्री राम कहा
मैंने सोचा कि उसमें धर्मों की ठंडक है
मन हुआ कि उस जैसा बर्फ बन जाऊँ
बादल सा उड़कर कहीं बरसूँ
पर उसके अंदर तोप तलवारों से सजे मंदिर और मस्जिद थे।

3

फिलहाल इस सोच में हूँ कि और कब तक रहूँगा
कोई धर्माधिकारी इस उधेड़बुन से मुझे निकाले
बतलाए कि खुदा या ईश्वर जो भी ऊपर या नीचे है
उसे जंग के मुहावरे के अलावा और क्या आता है
हो सकता है कि मैं कुछ और दिन रह जाऊँ
बर्फीले लोगों के बीच गिलहरी या गौरैया बन फुदकूँ
निहायत बेवकूफ सा कुछ और दिन
समझौतापरस्ती के जी लूँ
बर्फ बने लोग कहाँ देखते हैं
कि कैसा वर्चुअल जीवन ढो रहे हैं दरख्त
जो बचे हुए हैं जंग की लपेट से अब तक
तूफानों में कैसे बिना हिले-डुले देखते हैं।

4

ऐसा नहीं कि मैं सोया पड़ा था
नींद में देखा कि पहाड़ों पर लगी है आग
तो तड़पता उठ खड़ा था
लोगों को चेताया था
कि यह आग तुम्हें बर्फ बना देगी
हालाँकि अंदर तुम्हारे खौलेगा लावा
तह-दर-तह अणुओं को चूरमचूर ध्वस्त करती आग
बंजर बना डालेगी धरती को
तुम्हारी बर्फीली हड्डियों तले जम जाएगी धरती की कंपन
जो कुछ हरा है रंगो से भरा है
बेरंग खंदकों में बदल जाएगा

सपनों जैसी ही आग थी जागने के बाद।

5

जो मारा गया उसका मुँह खुला था
आँखें खुली थीं
बर्फ बन चुके लोगों ने उनमें बर्फ डाल दी थी
कहते हैं कि कोई मजदूर था
घर से दूर बीबी-बच्चों की सोचता मेहनत करता था
कम खाता था
कि कभी लौटकर बचाए पैसों से बच्चों को मिठाइयाँ खिलाएगा
जब वह मरा तो उसकी जेब में से उसके सपने निकल आए
सपने उड़कर उसके बच्चों तक पहुँचे
बीबी रोई यह देखकर कि सपनों में बर्फ होती धरती का डर छिपा था
रोते-रोते उसे उल्टी हुई
इसके सिवा वह कर भी क्या सकती थी
यहाँ सूरज भी थक गया है

लोग बर्फ बन गए हैं।
a quick translation:
People have frozen into ice
People have frozen into solid ice
The sun is tired of pouring onto them
And they do not melt
The sun comes close and hits them
And I think that they will surely melt
That when light passes through them
They will weep knowing of the war they have joined
That it has charred comforting thoughts from the surface of Earth
The sun is tired
That it cannot sleep covered with shadows on it
The sun has seen many wars
It knows
That many wars precede any one war
That solving the riddles
Of the beginnings and ends
Mothers all over the world weep
I want people to see the tears in mothers' eyes

People have frozen eyesight.

2

A man frozen into ice walked by me
I felt that if he melts I will have cold water to drink
If I sit next to him then a shade will descend upon me
As I was wondering if he will let me sit next to him
He said in one voice Allah-ho-Akbar and Jai-Shree-Rama
I thought that he may possess the comfort of religions
I felt like becoming ice-frozen like him
That I could fly like a cloud and pour as rain
But within him were temples and mosques decorated with swords and cannons.

3

And now I am wondering how long will I exist
I wish that a religious authority gets me out of this fix
And tell me that Khoda or God whoever lives up there or down here
What else does he know other than metaphors of wars
May be I will live a few more days
And dance like a squirrel or a bird among ice-people
A few more days of stupidity
I may live with compromises
But the ice-people never notice
the virtual lives that the trees live
Those that are still safely away from the throes of war
How they watch without being perturbed.

4

Not that I was caught unawares
When in my dreams I saw the fire on the hills
I was awake in agony
I warned people
That this fire will freeze you into ice
Even though you will have within you boiling lava
The fire will destroy depths within you
It will dry the lands barren
Underneath your frozen bones the earth will freeze
All that is green and is full of colors
will turn colorless and will become large pits.

And when I was awake the fire was still razing just as in my dreams.

5

The killed one had his mouth agape
His eyes were wide open
The ice-people had put ice in his orifices
They say he was some worker
He worked hard away from his family
Thinking of his wife and children
He ate less
So that he could bring sweets for his children with his money saved
When he died, dreams flew out of his pockets
The dreams reached his children
The wife wept that the dreams had the fear of freezing Earth hidden in them
She vomited while crying
What else could she do anyway

Even the sun is tired here
People have turned into frozen ice.


Friday, December 29, 2017

नया साल मुबारक

कुछ तो शरारत का हक मुझे भी :-)

आसान कविता


यह कविता आसान कविता है
फूल को फूल और चिड़िया को चिड़िया कहती है
मोदी को मोदी और हिटलर को हिटलर कहती है
बात तुम तक ले जाती है
प्रगति-प्रयोग-छायावाद नहीं
यहाँ तक कि रेटोरिक भी नहीं है
गद्यात्मक है, पर पद्य है
आदर्श कविता है
दिमाग के तालों को खोलने की कोशिश इसमें नहीं है
पढ़कर कवि को दरकिनार करने वाले खेमेबाज लोग
इसे तात्कालिक नहीं कहेंगे
इस पर जल्द ही किसी मुहल्ले से कोई सम्मान घोषित होगा
बिल्कुल आसान है कविता
जैसे सुबह का नित्य-कर्म
इसे साँचा मानकर चल सकते हैं
इसके आधार पर छपने लायक कविताएँ लिख सकते हैं
गौर करें कि इसमें कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं है
दलित आदिवासी स्त्री तो क्या पंजाबी बंगाली नहीं है


कुछ नहीं कहती सिर्फ इसके कि
बात आप तक ले जाती है
बात कोई बात है ही नहीं तो मैं क्या करूँ।          (बनास जन - 2017)

मुश्किल कविता

ज़ुबान मुश्किल
बातां मुश्किल
कविता हे कि क्या हे रे
हल्लू हल्लू असर डालते
हौला कर दिया रे
भगाओ इसको
अरे मुश्किल अपने ग़ालिब क्या थोड़ा थे
होनाइच हे तो वैसा होवो
ख़लिश बोले तो ख़लिश बोलो
मुश्किल नीं करने का रे
हल्लू हल्लू नईं आने का रे
साफ-साफ बोलो कविता का खटिया मत खड़ा करो रे
क्याऽऽ मतलब कि पोस्ट-लेंग्वेज़
अपुन को इंगलिश में एम ए नहीं करना रे
बाप रे, क्या कविता बोले रे
तुम एक आदमी रे कि बोत सारे रे
कोन मुलुक का तुम एक मुलुक का कि बोत सारे
जो हो वहींच रहने का ना रे
कायकू बदलता रहता हम पकड़ीच नहीं पाता रे
तुम पॉलिटिक्स बोले तो पॉलिटिक्स करो
इश्क करो तो इश्कइच करो
दोनों साथ साथ नहीं होने का रे
अपना बारे में बोलो तो दूसरे को मत लाना
लोगां का बोलना तो अपने को छिपाना
हमूँ किधर शुरु करते रे
समझते तो समझ नहींच आते
पकड़ते तो पकड़ नहींच पाते

कुछ तो रास्ता बतलाना रे। 


Thursday, December 28, 2017

हम नहीं हटे, डर हटा पीछे कदम दो-चार

आज 'द लल्लनटॉप' में आ रही कविताएँ - 

#1) यह मुश्किल साल था
इतना चाहता हूं कि सामने दिखते दरख्त पर
चढ़ने की मुकम्मल तैयारी कर सकूं
मसलन आबिदा परवीन की गायकी छूट न जाए
तनाव के पल कैसे कटेंगे उसके बिना
कुछ जैज़ बाजा भी साथ हो कि डालों पर फुदकने का मन हो तो…
यह मुश्किल साल था
अब जान चुका हूं कि आने वाला हर साल मुश्किल ही होगा
इसलिए बिरियानी का पैक साथ ले जाना है
भले सब्जियां खाने की उम्र हो गई है
पर मछली थोड़े ही छोड़ सकते हैं
बुर्ज़ुआ आदतें हैं
तो जिन और टॉनिक भी चाहिए;
दरख्त पर साथी और भी होंगे
सबने कुछ इंतज़ाम किया ही होगा
कि साथ-साथ सितारों को देखें
नीहारिकाएं और हर कहीं प्यार अनंत
कल्पना करें कि सितारों के आगे से धरती कैसी दिखती होगी
इस तरह भूल जाएं थोड़ी देर सही
बीते साल भर की मुश्किलें
बीच-बीच में उतरना तो पड़ेगा
अभी ज़मीं पर रंग खिलने बाक़ी हैं
हमारे बच्चे जो युवा हो रहे हैं
रंगों की तलाश में जुटे हैं
उनकी कविताएं सुननी हैं
कुछ उन्हें सुनानी हैं
कोई साथी दरख्त से उतर रहा होगा
देखेंगे हम उसका उतरना
फिर सपनों में तैयारी करेंगे खुद उतरने की
इस तरह यह धरती यह कायनात बेहतर होती जाएगी पल दर पल
साल दर साल.

# 2) धरती ने अभी अरबों साल जीना है
सड़क के ठीक बीचोबीच जंगली गिरगिट;
हरे से भरा था उसका बदन
हरी गर्दन उठाकर उसने मेरी ओर देखा था
और रंग नहीं बदला था
गर्दन उठाए और नज़र में अनगिनत सवाल लिए
वह नवजात मानव-शिशु सा था
निहायत कमजोर और अपने होने में मशगूल
किसी भी पल तेज चलती गाड़ी के नीचे कुचला जा सकता था
उसे बचाने का कोई तरीका सोचना मुश्किल था
लापरवाह अराजक गर्दन कुछ कह रही थी
कि चारों ओर तेजी से बदलते रंगों के इन दिनों में
वह एक नाकाम मुहावरा नहीं था
हारी हुई फौजों का आखिरी सिपाही बन सड़क संभाले हुए था
उसे देखकर मुतमइन होना लाज़िम था कि
यह साल जैसा भी रहा
बदलते रहें रंग और कुचले जाएं हम बार-बार
धरती ने अभी अरबों साल जीना है.

# 3) खरबों बीते सालों सा यह साल भी बीत गया
सर्दी गर्मी बारिश के साथ झूठ और नफ़रत के व्यापार की
साल भर सूचनाएं आती रहीं
पंछी सुबह-शाम बहस-मशविरा करते
कि ऐसे प्रदूषण में रास्ता कैसे देखें
कभी अलग-थलग तो कभी मिल-जुलकर तरीके सोचे गए
यह साल हारते रहने का साल ही था
झूठ का दायरा इतना बढ़ गया
कि धरती के दोनों छोरों पर धुंध घनी थी
हर कोई याद करने की कोशिश में था कि
ऐसी धुंध पहले कब देखी गई थी
हालांकि इकट्ठे पंख फड़फड़ाने से धुंध छंटती नज़र आती
धरती पर बहुत कुछ स्थाई तौर पर बदल चुका था
चुंबकीय ध्रुव इस कदर हिल-डुल रहे थे
कि सही दिशाओं की पहचान करना मुश्किल हो चला था
बहरहाल धरती अपनी धुरी पर है
मौसम बदलते हैं जैसे उनको बदलना है
खरबों बीते सालों सा यह साल भी बीत गया
कायनात का सीना और चौड़ा हुआ
इतना कि अनगिनत छप्पन इंच मिट जाएंगे उसमें.

# 4) हम नहीं हटे, डर ही हटा पीछे कदम दो-चार
इस साल भी आस्मान में कई बार इंद्रधनुष खिला
नई कथाएं लिखी गईं, गीत रचे गए
बच्चे-बूढ़े सब ने पंख पसार सतरंगी धनुष छुआ कई बार
चिंताएं थीं, ऊंचाइयों से कौन नहीं डरता
पंख पिघल भी सकते थे इकारस की तरह
जो गिरे उनके लिए हम सबने आंसू बहाए
हवाओं में अलविदा कहकर चुंबन उछाले
और हाथों में हाथ रख सड़कों पर उतर आए
इस तरह हमने हराया डर को जो हमारे पंख कुतर रहा था
हमने उन सबकी ओर से इंद्रधनुष को और-और छुआ
जिनके पंख कुतरे गए थे;
मुश्किल रहा साल पर डर को घूरा हमने पुरजोर
हम नहीं हटे, डर ही हटा पीछे कदम दो-चार.

# 5) वह भी प्यार है
जो छूट गया
वह प्यार
जो रह गया है वह भी प्यार है
पिछली सरसों का पीला छूटा है
तो आ रहा है फिर से बसंत
आएंगे और गीत-संगीत
घर-घर से निकलेंगी
आज़ादी और बराबरी की आवाज़ें
धरती खारिज करेगी तानाशाह का घमंड
तूफानी हवाओं में धुनें गूंजेंगी प्यार की और-और.

Wednesday, December 13, 2017

जो उठना है, वह किस गटर में गिरना है



सतह से उठते सवाल : 'सतह से उठता आदमी' में से निकलते कुछ सवाल
-('नया पथ' के ताज़ा अंक में प्रकाशित लेख)

कहा जा सकता है कि 'सतह से उठता आदमी' मूलत: एक अस्तित्ववादी रचना है। गौरतलब बात यह है कि जब यह कहानी लिखी गई तब विश्व साहित्य में अस्तित्ववादी चिंतन अपने शिखर पर था। पर अस्तित्ववाद आखिर है क्या? अस्तित्ववाद पर आलोचकों की कई तरह की राय रही है। अक्सर अस्तित्ववाद का उल्लेख आलोचना की गंभीरता मात्र जताने के लिए होता है; सचमुच आलोचक क्या कहना चाहता है या साफ नहीं होता। अस्तित्ववाद जीवन में किसी बृहत्तर मकसद को ढूँढने से हमें रोकता है। पर 'सतह से उठता आदमी' कहानी हमें अपने अस्तित्व का एक बड़ा मकसद ढूँढने को कहती है, बशर्ते हमारी संवेदनाएं बिल्कुल कुंद न हो गई हों, जिसका खतरा आज व्यापक है। हमारी कोशिश यहाँ गंभीर आलोचना की नहीं, महज एक खुले दिमाग से पुनर्पाठ की है।

'सतह से उठता आदमी' में तीन मुख्य चरित्र हैं - कन्हैया लेखक का प्रतिरूप है या कथावाचक की भूमिका में है, कृष्णस्वरूप उसका मित्र है, जो कभी ग़रीब होता था और अब अच्छी नौकरी मिल जाने से आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में है, और रामनारायण, जिसे कृष्णस्वरूप जीनियस मानता है, जो कभी धनी घर का बिगड़ा लड़का था और अब बौद्धिक उलझनों में खोया हुआ शख्स है। चरित्रों को भरपूर उभारा गया है, जैसा अमूमन उपन्यास लेखन में होता है, पर यह एक कहानी है, उपन्यास नहीं। पर चरित्रों के उभार पर ध्यान देना ज़रूरी है, नहीं तो सतह से उठने की सतही समझ भर रह जा सकती है।

कौन है जो सतह से उठता है? क्या वह कन्हैया है, या कृष्णस्वरूप या रामनारायण? किस सतह से कोई उठता है? कहाँ पर, कहाँ तक उठता है? कहानी के आखिर में कन्हैया अकेले में गटर में थूकता है। क्या यह सतह से उठने की स्थिति है? हम किसी एक समझ को प्रतिष्ठित न कर अलग-अलग संभावनाओं को सामने आने दें तो बेहतर होगा।

कन्हैया और कृष्णस्वरूप पुराने दोस्त हैं। दोनों के बचपन और किशोर उम्र मुफलिसी में ग़रीबी में बीते हैं। सालों बाद कन्हैया कृष्णस्वरूप से मिलता है तो उस पता चलता है कि कृष्णस्वरूप संपन्न हो चुका है, पर संस्कारों से वह अभी भी आम ग़रीबों जैसा ही है। कृष्णस्वरूप के घर पर ही रामनारायण कन्हैया से इस तरह मिलता है, जैसे कि उनमें पुरानी पहचान हो, पर सचमुच वे पहले कभी मिले नहीं हैं। रामनारायण धनी माँ-बाप का लड़का है, जिनमें आपसी मेल नहीं है। रामनारायण बहुत पढ़ा-लिखा है और अपने पिता की तरह ही आड़ंबरों से बचता है, पर वह कुछ हद तक विक्षिप्त भी है। कृष्णस्वरूप की माली हालत में बदलाव में रामनारायण की माँ का हाथ है और लगता है इस वजह से रामनारायण कृष्णस्वरूप के साथ अपमानजनक ढंग से बातचीत करता है।

राजकमल से प्रकाशित नेमिचंद्र जैन द्वारा संपादित रचनावली के तीसरे खंड में यह कहानी संकलित है। इस संस्करण में अक्सर कुछ लफ्ज़ों को भारी टाइप शैली (bold) में रखा गया है। मसलन इस कहानी में 'भई वाह! उन दिनों कृष्णस्वरूप रोज गीता पढ़ता था' वाक्य में 'गीता' पर जोर है। क्या यह मुक्तिबोध का खुद का किया हुआ है, या संपादकीय निर्णय है - यह सवाल शोध का विषय है। 'उन दिनों' यानी वे जो मुफलिसी के दिन थे। जाहिर है कि 'उन दिनों' कहते हुए इसके बाइनरी विलोम 'इन दिनों' की ओर भी संकेत रहता है - इन दिनों क्या वह गीता पढ़ता है? इस पर कहानी में कोई तथ्य उजागर नहीं होता, पर हो सकता है कि इन दिनों वह गीता नहीं पढ़ता। गीता का पढ़ा जाना या न पढ़ा जाना क्या बतलाता है? भारतीय मानस में खास कर जिन्हें अब हिन्दू कहा जाता है, गीता को सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मानना आम बात है, वैसे ही जैेसे और समुदायों में बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहब आदि को सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मान लिया जाता है। गीता में सांख्य और योग के महत्वपूर्ण तत्व हैं और इनका इस्तेमाल कृष्ण द्वारा अर्जुन को जंग लड़ने के लिए तैयार करने के लिए किया गया है। एक स्वच्छंदतावादी (ऐनार्किस्ट) नास्तिक गीता को कैसे देखेगा? इसके मद्देनज़र और यह ध्यान में रखते हुए कि अक्सर मुक्तिबोध को मार्क्सवाद के दायरे में रखकर देखा गया है, यह बात गौरतलब है कि गीता लफ्ज़ बोल्ड फोंट में है। इससे मुक्तिबोध का कैसा पाठ बनता है? अगर यह संपादकीय हस्तक्षेप है, तो क्या किसी विशेष पाठ को सामने लाने की, उभारने की कोशिश है?

कहानी पढ़ कर यह भी लगता है मुक्तिबोध हमें नैतिकता बोध की ओर ले जा रहे हैं, पर क्या सचमुच ऐसा है? क्या कृष्णस्वरूप में नैतिकता बोध खत्म हो गया है कि वह अपने आदर्शों को छोड़कर अचानक मिल रही सुविधाओं को एक के बाद एक ग्रहण करता गया है? वह कृष्णस्वरूप जो 'कहा करता था, “चाहिए, चाहिए, चाहिए" ने सभ्यता को विकृत कर डाला है, मनुष्य-संबंध विकृत कर दिए हैं। तृष्णा बुरी चीज़ है। हमारा जीवन कुरुक्षेत्र है। वह धर्मक्षेत्र है। हर एक को योद्धा होना चाहिए। आसक्ति बुरी चीज़ है', वही आज 'खुशहाल तो है ही, खुशहाली से कुछ ज्यादा है। उसकी चाल-ढाल बदल गई है। वह मोटा हो गया है। पेट निकल आया है। ढाई सौ रुपए का सूट पहनता है।' इस नैतिकता बोध में नया कुछ नहीं है। आज के घोर पूँजीवादी, नवउदारवादी युग में तो इसे ओल्ड-फैशन्ड ही कहा जाएगा। जो खुशहाल है या खुशहाली से कुछ ज्यादा है, उसे लेकर परेशानी क्यों। दुनिया जाए भाड़ में, समाज में दलित, पिछड़े, ग़रीब हों तो हों, पैसे कमाओ, जै सिरीराम बोलो, ऐश करो, दारु-शारु पिओ और खर्राटे मारते हुए सोओ। कृष्णस्वरूप ही तो आज का नॉर्मल है, समाज के लिए परेशानी का सबब तो रामनारायण है, भले ही जिसकी 'बात में मजा आता है,’ जिसका 'भाषा पर प्रचंड अधिकार है।‘ फिर भी अगर ऐसा है कि कहानी के केंद्र में नैतिकता का सवाल है तो यह महज अस्तित्ववादी रचना नहीं है।

कृष्णस्वरूप के किरदार का एक मजेदार पक्ष यह है कि 'उन दिनों' उसके सपने में शंकराचार्य, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल भी आते थे। ऐसा वह कहता था। कहानी में हमें पता चलता है कि कृष्णस्वरूप सचमुच कन्हैया को प्रभावित करता था। लेकिन किस ढंग से?

इसके बाद का कथन है कि 'उसको' फ़िलॉसफ़ी की ज़रूरत थी, इसलिए कि 'उसका जीवन दुर्दशाग्रस्त था।' किसको? कृष्णस्वरूप को ही शायद, क्योंकि जीवन तो उसका दुर्दशाग्रस्त था। कन्हैया के बारे में भी हम बाद में जान पाते हैं कि उसका जीवन भी कृष्णस्वरूप जैसा ही रहा होगा। तो फ़िलॉसफ़ी की ज़रूरत कन्हैया को भी थी। कन्हैया कथावाचक की भूमिका में है, या कथावाचक हमें कहानी की दुनिया को कन्हैया की नज़रों से दिखलाना चाहता है। तो क्या मुक्तिबोध अपनी उलझनों को ही हमारे सामने रख रहे हैं? मुक्तिबोध उलझे हुए तो थे ही, यह एक बात उनके बारे में साफ कही जा सकती है कि अपने वक्त के और दीगर रचनाकारों की तुलना में मुक्तिबोध में बौद्धिक सवालों को लेकर जद्दोजहद कहीं ज्यादा सघन थी।

मुक्तिबोध जिस वक्त और जिन परिस्थितियों में रहकर साहित्य-लेखन कर रहे थे, उनको जीते हुए वे उन्नीसवीं सदी के अंत या बीसवीं सदी के शुरुआत तक की यूरोपी आधुनिकता के प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते थे। उनके पास 'फ़िलॉसफ़ी ऑफ द ऐबसर्ड' की जगह नहीं थी। या जगह बहुत थी तो वह शंकराचार्य, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल से अलग मार्क्स को जगह दे सकती होगी, पर आधुनिक भारत का जो अति-यथार्थ उनके सामने खुलता जा रहा था, उसके लिए सही फ़िलॉसफ़ी क्या हो सकती है, यह सवाल उन्हें तड़पाता होगा। मसलन कहानी में हम देखते हैं कि रामनारायण देखने में भयानक है। उसमें से 'अज्ञात, अप्राकृतिक विचित्रता' का भय जन्म लेता है। जाहिर है कि इस किरदार को भयानक शक्ल देते हुए कथाकार हमसे मुखातिब है। हम अपनी उस भयानक या विक्षिप्त शक्ल को देखने को मजबूर हो जाते हैं, जो न्याय पर अन्याय की जीत सह नहीं पाता, जो तड़पता रहता है।

कन्हैया ग़रीबी को, उसकी विद्रूपता को, और उसकी पशु-तुल्य नग्नता को जानता है। साथ ही उसके धर्म और दर्शन को भी जानता है। गाँधीवादी दर्शन ग़रीबों के लिए बड़े काम का है। वैराग्य भाव, अनासक्ति और कर्मयोग सचमुच एक लौह-कवच है, जिसको धारण करके मनुष्य आधा नंगापन और आधा भूखापन सह सकता है। ... उसके आधार पर आत्मगौरव, आत्मनियंत्रण और आत्मदृढ़ता का वरदान पा सकता है।' - यह कौन चीख रहा है? आगे और है - ‘ग़रीबी एक अनुभावत्मक जीवन है। कठोर से कठोर यथार्थ चारों तरफ़ से घेरे हुए है, एक विराट नकार, एक विराट शून्य-सा छाया हुआ है। लेकिन, इस शून्य के जबड़ों में मांसाशी दाँत और रक्तपायी जीभ हैं।' तो क्या गीता, गाँधीवादी दर्शन, शंकराचार्य और जवाहरलाल उन्हें उसी कठोर यथार्थ में दिखते हैं? अव्वल तो कहानी में कहानी होना पहली शर्त है, दर्शन हो तो बढ़िया, न हो तो भी ठीक। अगर बौद्धिकता में जाना ही है तो हजार साल पहले के पुनरुत्थानवादी वेदांती और अपने समय में पश्चिम के शांतिवादियों से प्रभावित घोषित राष्ट्रपिता और इतिहास में रुचि रखते एक राष्ट्रनेता का नाम एक साथ क्यों? क्या यह महज उलझन है, या बयान है? इस रचना के दो ही दशकों बाद कुछ मार्क्सवादी चिंतकों ने गीता में मुक्तिकामी सोच प्रतिष्ठित करने की कोशिश की थी। भारतीय वाम चिंतन में ऐसी उलझनों की भरमार है।

क्या मुक्तिबोध के लिए जीवन का कोई तार्किक आधार था? क्या जीवन का कोई मकसद है - क्या वह मकसद अपने वक्त के दक्षिण एशिया में महानायक रह चुके शंकर, गाँधी और नेहरू जैसे नामों में है, या वह उस 'अनुभवात्मक जीवन' में ही कहीं है, जो ग़रीबी है? एक साहित्य-रचना के रूप में 'सतह से उठता आदमी' में सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन सवालों को मुक्तिबोध खुला छोड़ देते हैं, जो कि उनके समकालीन ही नहीं, बाद के रचनाकारों में भी विरल है। कन्हैया को जीवन की सचाइयों का पता है, पर उसके साथ हम कृष्णस्वरूप और जीनियस रामनारायण के खेल को निर्लिप्त भाव से देखते हैं। खेल कहें या कि पुराने ढंग से भव-लीला कहें। यह जो नए पुराने के बीच का आवागमन है, इसमें मुक्तिबोध अद्वितीय हैं। कहानी में दुर्योधन की प्रसिद्ध उक्ति 'जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति/ जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः/ केनापि देवेन हृदिस्थितेन/यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि' का इस्तेमाल किया गया है। कृष्णस्वरूप का दुर्योधन धर्म-अधर्म के सामान्य द्वंद्वों में से आराम से गुजरता है। जो भी सही-ग़लत है, वह सब विधि का विधान है, इस को मानने वाला हीनता से ग्रस्त ग़रीब कृष्णस्वरूप बाद में स्वेच्छा से खुद को बदलता है। हो सकता है कि तब भी वह 'यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि' मानता हो, या कि उसके लिए इसे मानते रहना मजबूरी है, क्योंकि ऐसा न हो तो वह भयानक दिखता रामनारायण जो उसके अंदर भी कहीं बैठा है, उसे जीने न देगा।

नैतिकता बोध के सवाल रुकते नहीं हैं। जो शानदार खूबसूरत है, क्या वह सचमुच शानदार और खूबसूरत है? रामनारायण के पिता जात-पात नहीं मानते, हरि का नाम लेते हैं तो उनकी शानदार खूबसूरत पत्नी उन्हें ताना देकर कहती है कि 'जाओ, उस रंडी के पास जाकर बैठो।' एक उदार पुरुष अपनी खूबसूरत, पर रुढ़िवादी पत्नी के साथ कैसे निभाए, अहंकारी माँ रामनारायण को उशृंखल बनने से कैसे रोके, ये अस्तित्व के सामान्य संकट है। पर इन सबके साथ कृष्णस्वरूप में आ रहे बदलाव, उसके अंदर का लोलुप, महत्वाकांक्षी इंसान जो सतह से ऊपर उठने को बेताब है, उसके संकट विकट हैं। अपने विपन्न अतीत से निकलकर सुविधाओं से लदते रह कर भी वह लाचार है कि वह भयानक दिखता रामनारायण उसे हेय नज़रों से देखे, उसे दुत्कारे और वह कुछ न कर पाए, सिर्फ इसके कि वह कहता रहे कि 'सचमुच जीनियस' है। 'उन दिनों' का उसका गीता पाठ, उसके सपने में आते महानायक, सभी इन दिनों बेअसर हैं।

हम इन सवालों का जवाब नहीं ढूँढेंगे, क्योंकि जवाब तो हमें मालूम हैं। कृष्णस्वरूप के अंदर कोई रोता, चिंघाड़ता होगा, यह हम जानते हैं क्योंकि हम सब अपनी-अपनी सतह से उठने की प्रक्रियाओं में फँसे हुए हैं। ये प्रक्रियाएँ हमारे निजी दायरों में चल रही हैं और ये हमारे बड़े सामाजिक दायरों में भी चल रही हैं। इस लिए यह कहानी सिर्फ आत्म-अन्वेषण नहीं है। हम चीख चिल्ला कर झूठ को सच कहने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं, हत्यारों को जन-गण-मन अधिनायक बना देते हैं। हमारे अंदर कोई हमें रोकने की, सचेत करने की कोशिश करता है, तो हम उसे जीनियस कह कर अपने से दूर कर लेते हैं, उसकी झिड़कों को झेल लेते हैं। हम जानते रहे, देखते रहे कि देश की आधी जनता को और विपन्नता की ओर धकेला जा रहा है, और हममें इतना भी विवेक नहीं बचा रहा कि हम भयानक दिखते जीनियसों को पहचान कर वापस अपने अंदर कभी देख सकें।

अच्छी अस्तित्ववादी रचना में उदासीनता लाजिम है, हालाँकि अक्सर ऐसी रचनाएँ पढ़ने के बाद मुख्य बोध अवसाद का होता है। पर मुक्तिबोध का उदासीन कथावाचन दरअसल उदासीन है नहीं, और समझौतों के किस स्तर तक हम गिर सकते हैं, जो उठना है, वह किस गटर में गिरना है, कन्हैया इसे थूकता हुआ हमें दिखलाता है। मुक्तिबोध हमें कहानी में सीधे नहीं कहते कि हम नैतिक सवालों पर गौर करें, पर पूरी कहानी इसी संकट पर केंद्रित है। कन्हैया की कहानी हमारी कहानी है। यह बस दुनिया को देखना भर नहीं है, उसे और उस-में जीना है। हम कितना उठ रहे हैं और कितना गटर में गिर रहे हैं, यह केंद्रीय सवाल बन कर सामने आता है। इसलिए अस्तित्ववादी होते हुए भी यह कहानी बहुत कुछ और है।